Saturday, November 27, 2021
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मछली के कचरे को रीसाइक्लिंग कर मछुआरा, सालाना 13 लाख रुपये कमा रहा

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New Delhi: मछली-चावल बंगाल, बिहार, सहित दक्षिण भारत के लोगों की पसंदीदा डिश है। इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि यहां के लोग सप्ताह में तीन दिन मछली चावल जरूर खाते हैं। ऐसे में मछली की डिमांड भी बहुत अधिक होती है। लेकिन आपने अकसर देखा होगा कि मछली बेचने वाले व्यक्ति मछली के कचरे को फेंक देता है। अगर आप भी मछली बेचने की दुकान या फिर कारोबार करते हैं तो आपके लिए यह खबर बेहद जरूरी है। दरअसल, एक मछुआरा ने मछली के कचरे को रिसाइक्लिंग कर सालाना 13 करोड़ रुपये कमा रहा है। चैन्नई स्थित पट्टीनपक्कम के नंबिकै नगर के 41 साल के मछुआरा जिसका नाम के वेलंकन्नी है। उन्होंने बताया कि मछली के कचरे को रिसाइक्लिंग करने के फैसले ने मेरे जीवन को बदल कर रख दिया है।

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उन्होंने बताया कि एक कंपनी शुरु की है, जिसमें मछली के कचरे को रिसाइक्लिंग कर मूल्य वर्धित उत्पादों में परिवर्तित करता है। इस कंपनी के शुरु होने से सालाना 13 लाख रुपये की इनकम हो रही है। साल 2018 तक वेलकन्नी मछली बेचती थी।और उसका पति मछली को निकालने के लिए जाल बुनता था। मछली को पकडऩे और बेचने के दौरान महीने का सिर्फ 10 हजार से 15 हजार की इनकम हो पाती थी। घर में दो बेटियां हैं, जिनकी शिक्षा के लिए ब्याज दर पर ऋण भी लेना पड़ा।
यहां से बदली जिंदगी
वैल्कनैनी बताती हैं कि एक दिन उन्हें सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रैकिश एक्वाकल्चर की ओर से बुलाया गया। जहां उन्हें मछली के कचरे को रिसाइक्लिंग करने का प्रशिक्षण दिया गया। इसके बाद नम्बिक्काई में एक समहू का गठन किया गया। 18 फरवरी 2019 को फिश वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना की गई। वह बताते हैं कि इसके बाद उनका जीवन बदल गया।

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बाजारों से लाने लगे मछली का कचरा
कंपनी के शुरु होने के बाद वह बाजारों से रोजाना 200-300 किलोग्राम मछली का कचरा लाने लगे, और इसे रिसाइक्लिंग कर वेल्यू प्रोडक्ट बनाने में इसका इस्तेमाल करने लगे। इसके बाद केरल, गुजरात, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल से ऑर्डर आने लगे। जिसे हमे बहुत फायदा हुआ।
क्या कहते हैं सीआईबीए के निदेशक
सीआईबीए के निदेशक केके विजयन कहते हैं कि भारत सरकार की स्वच्छ भारत की पहल के तहत इस तकनीक का विकास किया गया है। समुंद्र किनारे और मछली बाजारों में मछली के कचरे को लेते हैं, जिससे वहां के क्षेत्र में रहने वाले लोगों को असुविधा होती है और इससे पर्यावरण प्रदूषण भी होता है। उन्होंने कहा कि हमने एक ऐसी तकनीक को विकसित किया है जिससे मछली के कचरे को धन के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। मछली के कचरे से जो उत्पाद बनाया जाता है, उनमें पहला प्लैंकटन प्लस और दूसरा हॉर्टी प्लस। उन्होंने बताया कि इस प्रोडक्ट से जलीय कृषि और बागवानी में मदद मिलती है।

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