Saturday, November 27, 2021
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दृष्टिहीन सरिता चौरे ने पैरा जूडो चैंपियनशिप में जीता कांस्य, ओलांपिक पदक जीतने का है सपना

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अंधे लोगों की दुनिया कैसी होती होगी इसका वो लोग अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं, जिनके पास आंखों की रोश्नी है. लेकिन दृष्टिहीन लोग अपने आपको किसी से कमतर कभी नहीं समझते हैं. बहुत से ऐसे दृष्टिहीन लोग हैं, जो अपनी ज़िंदगी में कुछ नया करने के लिए शरीर की कमी को आगे नहीं आने देते हैं.

रष्ट्रीय दृष्टिहीनता एवं दृष्टिबाधित सर्वे 2019 के मुताबिक देश की कुल आबादी के 0.36 फीसदी लोग दृष्टिहीन हैं. इन लोगों की ज़िंदगी को सुधारने के लिए सरकार योजनाएं तो चलाती हैं लेकिन सभी लोग तक ये पहुंच नहीं पाती है. भारत में कई ऐसे दृष्टिबाधित लोग हुए हैं, जो अपनी प्रतिभा को पहचानकर आगे बढ़े हैं और लोगों को प्रेरित किया है. ऐसे नामों की फेहरिस्त छोटी जरूर है लेकिन प्रेरणादायक है. मध्यप्रदेश की रहने वाली सरिता चौरे की कहानी दृष्टिबाधित लोगों को अवश्य हिम्मत देगी.

मध्यप्रदेश की रहने वाली सरिता चौरे बचपन से अंधी हैं. मजदूर पिता की बेटी सरिता का सपना एथिलीट बनना था. अपने सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने NGO Sightavers India के जुडोइस्ट्स के प्रशिक्षण में भाग लिया. सरिता चौरे ने मेहनत के बलबूते साल 2018 में 44 किलोग्राम जूनिवर वर्ग में छठे राष्ट्रीय ब्लाइंड और पैरा जूडो चैंपियनशिप में पहला कांस्य पदक अपने नाम किया था. साल 2019 में बर्मिघम में आयोजित राष्ट्रमंडल जूडो चैम्पियनशिप में भी कांस्य पदक जीतकर सरिता ने देश का नाम रोश्न किया था.

बीए फाइनल इयर में पढ़ने वाली सरिता का कहना है कि मैं अपना खेल अभी खत्म नहीं करूंगी. मुझे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलकर अपनी पहचान बनानी है. कोरोना वायरस महामारी खत्म होने के बाद मैं 2024 ग्रीष्मकालिन ओलांपिक की तैयारी शुरू कर दूंगी. हालांकि वह अभी घर में भी अपनी प्रैक्टिस कर रही हैं.

सरिता की ज़िंदगी में बदलाव लाने वाली एनजीओ Sightavers एक वैश्विक विकास संगठन है, जो 1965 से अंधे लोगों की ज़िंदगी में रोश्नी फैलाने का काम कर रहा है. ये एनजीओ देश के 100 जिलों में नेत्र स्वास्थ्य के लिए काम कर रहा है. ये संस्था दृष्टिहीन लोगों की शिक्षा से लेकर उनके कौशल तक को निखारने का काम करता है.

 

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