Monday, April 19, 2021
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बचपन में गंवाया एक हाथ, आज भाला फेंकने में वल्र्ड रिकॉर्ड बनाकर जीत चुके हैं अनेकों मेडल

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यूं तो जीवन ऐनकर्स समस्याओं से घिरी होती है, लेकिन कुछ लोग इन समस्याओं के आगे अपने घुटने टेक देते हैं और कुछ लोग इन समस्याओं को अपनी ताकत बना लेते हैं। किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए जरूरी होता है कि आपका पूरा ध्यान आपके लक्ष्य पर ही केन्द्रित हो, केवल आपको आपकी उपलब्धि की प्राप्ति हो सकती है। आज बात एक ऐसे व्यक्तित्व की जो इन सभी वाक्यों पर खरा उतरा। जिन्होंने समस्याओं का सामना डट कर किया, जिन्होंने लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित रखा, और सफलता की कड़ी चढ़ता चली गई।

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देश प्रेमी देवेंद्र झाझड़िया
देवेंद्र झाझड़िया एक ऐसा नाम, जिसे सुनते ही फ़क्र से सीना चैड़ा हो जाता है और आँखों में आँसू भी आते हैं। यह वो शक्स है जिसने न सिर्फ अपने परिवार का अपितु भारत का नाम भी ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। देवेंद्र झाझड़िया, एक गरीब परिवार में जन्मा, चुरू राजस्थान में रहने वाला वो होनहार व्यक्ति जिसके आगे आज समस्याओं ने घुटने टेक दिए हैं। आइए जानते हैं कि देवेंद्र झाझड़िया के इस संघर्षपूर्ण सफर के बारें में।

8 साल की उम्र में लगा था करंत, काटना पड़ा था एक हाथ
देवेंद्र झाझड़िया को बचपन से ही पेड़ पर चढ़ने का एक शौक था। लेकिन पता नहीं था कि यह पेड़ पर चढ़ना उन्हें इतना भारी पड़ जाएगा। एक दिन ऐसे ही देवेंद्र पेड़ पर चढ़ गए, लेकिन पेड़ के बीच से 11,000 वॉल्ट का बिजली का तार गुजर रहा था। जाने-अनजाने में देवेंद्र का हाथ उस तार पर लग गया, उसके बाद देवेंद्र की चीख सुनकर सभी गाँव वालों ने उनकी माँ को बताया। देवेंद्र को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनका बायाँ हाथ झुलसने के कारण काटना पड़ा।

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देवेंद्र की माँ को सताने लगी चिंता
एक 8 साल का बच्चा था जिसके सामने अभी उसकी पूरी जिंदगी है, उसका हाथ काट दिया जाता है। कितना मुश्किल होगा यह क्षण देवेंद्र और उनके माता-पिता के लिए। अब उनकी माँ को उनकी चिंता सताने लगी थी क्यूंकि देवेंद्र ही अपने परिवार का एकमात्र सहारा थे। देवेंद्र ने बच्चों के साथ खेलना भी छोड़ दिया था लेकिन उनकी माँ ने उन्हें खेलने के लिए प्रेरित किया। उसके बाद धीरे-धीरे देवेंद्र की खेल में दिलचस्पी पैदा हुई।

हाथ कटने के बाद भी कई मेडल
बच्चों के साथ खेल-खेल में ही देवेंद्र में चीजों को दूर फेंकने का हुनर ​​पैदा हुआ। पढ़ाई पर तो देवेंद्र का ध्यान ही रहता था लेकिन उन्हें खेलना पसंद था। एक बार कोच आर डी सिंह की नज़र देवेंद्र पर पढ़ी और उन्होंने देवेंद्र के हुनर ​​को परखा। केवल उन्होंने देवेंद्र को प्रशिक्षण देने का फैसला किया। उसके बाद देवेंद्र ने पहली बार जिले के भाला के टूर्स में स्वर्ण पदक जीता। यह पदक देवेंद्र के लिए किसी ओल के मेडल से कम नहीं था।

पैरा-ओलंपिक में ऊंचा किया भारत का तिरंगा
उसके बाद 2002 में देवेंद्र भारतीय टीम में शामिल हुए और दक्षिण कोरिया में हुए पैसेफिक खेल में भी स्वर्ण पदक जीता। वर्ष 2004 में तो देवेंद्र की पूरी जिंदगी ही बदल गई जब उन्होंने एथेंस पैरा-ओलंपिक में न सिर्फ स्वर्ण पदक जीता अपितु नया वल्र्ड रिकॉर्ड भी बना दिया। देवेंद्र के लिए यह बहुत बड़ी बात थी। उसके बाद भी देवेंद्र रुके नहीं, देवेंद्र ने रियो पैरा-ओलंपिक में एक बार फिर अपना ही रिकॉर्ड तोड़कर नया वल्र्ड रिकॉर्ड बना दिया।

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अपने बुलंद हौंसले के लिए मिल चुके हैं कई
प्रतिष्ठित देवेंद्र को देश से भी बहुत प्यार है। देवेंद्र ने एक साक्षात्कार में बताया कि पदक जीतकर तो उन्हें खुशी मिलती ही है लेकिन जब भारत का झंडा ऊपर होता है तो उनकी यह खुशी दुगनी हो जाती है। देवेंद्र को उनकी मेहनत के लिए उन्हें 2004 में अर्जुन अवार्ड के लिए एथेलिटिक्स, 2017 में राजीव गांधी खेल रत्न और राजीव गांधी खेल रत्न अवार्ड के लिए पैरा-एथेलिटिक्स से सम्मानित किया जा चुका है। साथ ही देवेंद्र को 2012 में पद्म श्री से भी नवाजा किया गया है।

सिटीमेल न्यूज देवेंद्र के इस जतन को दिल से सलाम करता है।

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