Friday, April 16, 2021
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90 प्रतिशत दिव्यांग शंकर ने खुद बनाई अपनी किस्मत, IIT पास कर बिहार में बजाया डंका, संवार रहे हैं गरीब बच्चों का भविष्य

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कर खुद को इतना बुलंद कि खुदा भी पूछे कि बता तेरी मर्जी क्या है। बिहार के शंकर की सफलता भी इस कहावत से कम नहीं है। उसके हौंसले, कठिन परिश्रम और जज्बे को देखकर आखिर भगवान को भी उससे पूछना पड़ा कि बता आखिर तू चाहता क्या है। जी-हां ये है शंकर की वो जादुई कहानी, जिससे सुनने वाले भावुक तो होंगे ही , साथ ही उनसे प्रेरणा भी लिए बिना भी नहीं रह सकते। पोलियो की वजह से 90 प्रतिशत तक दिव्यांग हो चुके शंकर ने अपनी बौद्धिक क्षमता और दृढ इच्छा शक्ति के आधार पर खुद की किस्मत अपने हाथों से लिखी है।

भेदभाव के बाद भी नहीं हारा हौंसला

आज यह युवक शंकर उस मुकाम पर है जहां पहुंचना हर किसी के बूते की बात नहीं होती। छोटी सी उम्र में ही शंकर ने भेदभाव और तमाम कुरीतियों का सामना करते हुए अपनी सफलता के पड़ाव को पूरा किया है। शंकर ने तमाम हालातों को सहन कर इस सफलता की कहानी को लिखा है। शंकर ने अपनी पढ़ाई के दौरान पहले एंटे्रस एगजाम नवोदय स्कूल के लिए पास किया था। मगर सरकारी नियमों में आई कई अड़चनों की वजह से उन्हें इसमें एडमिशन नहीं दिया गया। मगर शंकर ने हार नहीं मानी। गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ाई करते हुए शंकर ने नेशनल साइंस टैलेंट सर्च परीक्षा-2008 को भी अपने बूते पर पास कर लिया।

आईआईटी पास कर बजाया डंका

तमाम विपरित हालातों का सामना करते हुए शंकर ने खूब पढ़ाई की। इसका परिणाम भी बहुत सुखद रहा। उन्होंने वर्ष 2013 में आईआईटी परीक्षा पास करके पूरे बिहार प्रदेश में खुद को साबित करके दिखा दिया। पंरतु बोर्ड परीक्षा में मात्र दो नंबर कम होने की वजह से उन्हें एडमिशन नहीं मिल पाया। पंरतु उन्होंने हार मानना ही नहीें सीखा था। इसके बाद शंकर ने साईंस स्ट्रीम से स्नातक में दाखिला लेकर अपने हीरो स्टीफन हॉकिंग को आदर्श मानते हुए आगे का लक्ष्य तय किया।

अब बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं वो

खूब पढ़ाई लिखाई करने के बाद शंकर ने सोचा कि क्यों ना गांव के बच्चों का टैलेंट भी निखारा जाए। उन्हें अवसर मुहैया करवाया जाए, ताकि वह भी अपना भविष्य संवार सकें। यह सोचकर शंकर ने अपने घर में ही एक कंप्यूटर लाईब्रेरी खोल ली। जहां गांव के प्रतिभाशाली और गरीब बच्चों को टे्रनिंग देनी शुरू कर दी। जो बच्चे खूब पढऩा चाहते थे, मगर मंहगी पढ़ाई होने की वजह से खुद को असक्षम मान रहे थे, उनके लिए शंकर ने शिक्षा के दरवाजे खोल दिए। उन्होंने बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू करवा दी। इसका परिणाम यह हुआ कि उनके द्वारा पढ़ाए गए कई बच्चे NTSE और Olympiads  जैसी परीक्षाओं को जीत चुके हैं। शंकर ने खुद के लिए ऐसा रास्ता तैयार किया, जोकि केवल सफलता की मंजिल पर ही पहुंचता था। ऐसे ही उन्होंने जरूरतमंद बच्चों को भी रास्ता बनाकर दिया।

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