Friday, April 23, 2021
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लॉकडाऊन में धंधा हुआ बंद, सिर पर चढ़ा कर्ज, नहीं हारी इस किन्नर ने हिम्मत,फिर शुरू किया अपना बिजनेस

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Sanjay Kapoorhttps://citymailnews.com
Sanjay kapoor is a chief editor of citymail media group

किन्नर समाज को लोग घृणा की दृष्टि से देखते हैं। समाज में उन्हें वह मान सम्मान और प्रतिष्ठा नहीं मिलती, जिसके वह हकदार होते हैं। लेकिन आज हम आपको ऐसी ही एक किन्नर से रूबरू करवाएंगे, जिसे अपने मां-बाप का भरपूर प्यार तो मिला ही, साथ अपने किन्नर समाज ने भी उन्हें सम्मान दिया। इस किन्नर का नाम है राजवी, जोकि सूरत की रहने वाली है।

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बधाई गीत नहीं गाए राजवी ने

राजवी ने अपने जज्बे से खुद का अपना एक मुकाम बनाया। वह अन्य किन्नरों की तरह से नाच गाना या बधाई गीत गाकर अपना पालन पोषण नहीं करती है। वह खुद का अपना व्यापार कर इतना पैसा कमा लेती है, जिससे उसका गुजारा अच्छा चलता है। राजवी अपनी नमकीन की दुकान चलाती है, जिससे वह हर रोज 2000 रुपए तक कमा लेती है।

ठाकुर परिवार में जन्मी थी राजवी

राजवी का जन्म सूरत के एक ठाकुर परिवार में हुआ था और उनका लालन पालन भी एक बेटे की तरह से ही किया गया था। उनके परिवार को राजवी के किन्नर होने की जानकारी थी, इसके बावजूद उन्होंने उसे किन्नर समाज को नहीं दिया। राजवी का नाम पहले चितेयु ठाकुर था। उस समय वह खुद को भी एक लडक़ा समझती थी और उनकी तरह से रहन सहन भी था। राजवी की पूरी शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से हुई थी। लेकिन जब उसे पूरी हकीकत पता चली तो उसने लडक़ों का वेश त्यागकर एक किन्नर की तरह से ही जीवन शुरू कर दिया।

राजवी ने खोली थी पेट्स शॉप

बेशक वह ना तो लडक़ी थी और ना ही लडक़ा। उसमें पैदाईशी तौर पर किन्नर के ही गुण थे। इसलिए किन्नर की भांति ही अपना जीवन शुरू कर दिया। इसलिए उसने अपना नाम भी बदलकर राजवी रख लिया। 32 साल की उम्र में राजवी ने पेट्स की दुकान खोल ली थी। उनका काम बहुत अच्छा चल रहा था। मगर लॉकडाऊन में उनका यह काम बंद हो गया और खर्चे वही बढ़ते रहे। इसलिए उसके ऊपर काफी कर्जा भी हो गया।

आया था आत्महत्या का विचार

इस हालात में राजवी परेशान हो गई और आत्महत्या का विचार भी उसके मन में आया। पंरतु मां के प्रोत्साहन के चलते उसने एक नमकीन की दुकान खोल ली। इस दुकान से उसका खर्च भी सही चल रहा है और वह अपना कर्ज भी उतार रही है। राजवी बताती है कि वह बच्चों को टयूशन भी पढ़ाती है। इसमें उसे भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता। हालांकि नमकीन की दुकान पर आने से कुछ लोग हिचकते हैं, मगर उसे अहसास है कि जल्द ही वह भी उनकी दुकान पर आने लगेंगे।

इस तरह से जीना अच्छा समझा

इस तरह से एक किन्नर ने खुद की मेहनत से सम्मान की जिंदगी जीना बेहतर समझा। राजवी बताती है कि गुजरात में किन्नर समाज के लोगों की संख्या काफी अधिक है। इसलिए 12 साल की उम्र में ही किन्नर समाज से उसका जुड़ाव हो गया था। जिनका उन्हें खूब प्यार भी मिला। गुजरात के 95 प्रतिशत किन्नरों से उसकी जान पहचान भी है। इसके बावजूद वह अपनी खुद की रोजी रोटी कमाने को अधिक तव्वजो देती है।

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