Thursday, April 22, 2021
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किसी मसीहा से कम नहीं हैं दिव्यांग राधेश्याम, मगर हौंसला ऐसा कि बड़े से बड़ा दानवीर भी उनके सामने है बौना

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Sanjay Kapoorhttps://citymailnews.com
Sanjay kapoor is a chief editor of citymail media group

दिव्यांग शब्द कैसे पड़ा, शायद बहुत से लोगों को इसकी जानकारी नहीं होगी। आपको बताते हैं कि विकलांग शब्द को एक तरह से सामाजिक दृष्टि से हीन माना जाता है, इसलिए विकलांग की बजाए अब दिव्यांग शब्द का ही अधिक प्रयोग किया जाने लगा है। इसके अलावा इस शब्द में एक और खासियत छुपी हुई है। दिव्यांग शब्द में एक प्रकार का दिव्य शक्ति का प्रवाह दिखाई देता है। यह कई मायनों में सच भी है, कहा जाता है कि दिव्यांग इंसान में एक सामान्य इंसान के मुकाबले दिव्य शक्ति होती है। उसके भीतर मानवता का संचार होता है। ऐसे लोग दूसरों की मदद के प्रति बढ़ चढक़र सामने आते हैं।

किसी मसीहा से कम नहीं हैं राधेश्याम

आज आपको एक ऐसी शख्सियत से रूबरू करवाते हैं। इनका नाम है राधेश्याम गुप्ता, जोकि बिहार के एक छोटे से गांव पैंगम्बपुर के रहने वाले हैं। राधेश्याम ने दिव्यांगता को मात देते हुए गरीब व जरूरतमंद लोगों के प्रति अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया है। फिलहाल वह एक छोटी सी दुकान चलाते हैं और इस दुकान की कमाई का अधिकांश हिस्सा लोगों की सेवा में लगा देते हैं। यह जज्बा उनमें बचपन से ही है।

दूसरे दिव्यांग को दे दी थी ट्राई साईकिल

इसी जज्बे के चलते राधेश्याम गुप्ता ने उन्हें सरकार से मिली ट्राईसाईकिल अवधेश मिश्रा नाम के एक अन्य दिव्यांग को भेंट कर दी। राधेश्याम गुप्ता का मानना था कि इस ट्राईसाईकिल की उनसे ज्यादा जरूरत मिश्रा जी को थी। इसलिए उन्होंने अपनी यह साईकिल उन्हें दे दी और खुद एक छड़ी के सहारे चलते थे। बचपन से ही विकलांग राधेश्याम गुप्ता का पूरा जीवन अभावों में बीता। उनके पिता स्वर्गीय नंदलाल अपना घर चलाने के लिए दो किलो मूंगफली लेकर साईकिल पर बेचने जाया करते थे। घर में उनके चार भाई बहन और थे, जिनका लालन पालन उनकी मां चंद्रावती द्वारा किया जाता था। वह बेहद अभावों में रहते थे। तन पर पहनने के लिए फटे पुराने कपड़े हुआ करते थे।

मुश्किल से पढ़ पाए हैं गुप्ता जी

श्री गुप्ता बताते हैं कि उनके पिता शिक्षा का महत्व समझते थे, इसलिए गांव के स्कूल में उनका दाखिला करवा दिया गया था। वह पांचवीं तक ही पढ़े थे और करीब 11 साल के थे। तभी उन्हें अपने पिता की कठिनाईयां विचलित करने लगी थी। इसलिए उन्होंने भी अपने पिता से कोई काम करने की इच्छा जताई। दिक्कतों को देखते हुए उनके पिता ने इसकी सहमति दे दी। इसके बाद उनके पिता टॉफी, चॉकलेट जैसी चीजें लाकर देते थे, जिन्हें वह बेचने के लिए मंडी में चले जाया करते थे। इस काम से उन्हें कुछ आमदनी होने लगी, जिससे घर चलाने में मदद होने लगी। यही नहीं बल्कि अपने काम से कुछ रुपए जोडक़र उन्होंने अपनी एक बहन की शादी भी कर दी थी।

बच्चों को टयूशन देना शुरू किया

किसी तरह से राधेश्याम गुप्ता काम के साथ साथ पढ़ाई भी करते रहे और आठवीं तक पहुंचने के बाद बाजार में सामान बेचना छोड़ दिया। वह दलित बस्ती में जाकर बच्चों को टयूशन देने लगे। इसके लिए उन्होंने कोई फीस नहीं रखी थी, जो भी कुछ अपनी मर्जी से दे देता और जो नहीं दे पाता था, उससे वह कुछ नहीं लेते थे। यह सिलसिला चलता रहा और उन्होंने रामपुर के सुखदेव अंटर कॉलेज से प्रथम श्रेणी में इंटर पास कर ली।

पटना आकर शुरू की समाजसेवा

इसके बाद राधेश्याम गुप्ता अपना गांव छोडक़र रोजगार की तलाश में पटना आ गए। वहां रेलवे स्टेशन पर वह छोटा मोटा सामान बेचने का काम करने लगे। इस दौरान लोगों को ठंड व गर्मी में सडक़ों में बेहाल सोता या रहते हुए देखकर परेशान हो जाते थे। श्री गुप्ता खुद को उनसे बेहतर पाते थे और इसके चलते ही जिदंगी भर उन्होंने लोगों की सेवा करने की ठान ली। इसलिए उन्होंने लोगों की सेवा व सहायता करने के लिए सोशल मीडिया को सहारा बनाया। वह जरूरतमंद लोगों की सेवा करने की अपील सोशल मीडिया के जरिए करते हैं और उसका एकाऊंट खुलवाकर वही नंबर सार्वजनिक कर देते हैं। इस तरह से दानदाता लोग जरूरतमंदों की सहायता कर देते हैं।

इस तरह से सेवाभाव करने वालों की चेन बनाई

श्री गुप्ता बताते हैं कि इस काम को जिन्होंने भी सुना उन्होंने अपनी ओर से भी मदद करने का आश्वासन दिया। इस तरह से सेवाभाव करने वाले लोगों की एक चेन बन गई। उनके अनुसार फिलहाल दुबई, सिंगापुर और अफ्रीका सहित कई देशों के लोग उनसे जुड़े हुए हैं। छोटी सी दुकान चलाने वाले राधेश्याम गुप्ता का जज्बा किसी मसीहा से कम नहीं है। खुद दिव्यांग होते हुए भी उन्होंने जरूरतमंद लोगों के लिए एक ऐसी श्रृंखला बना दी है, जोकि तारीफ के काबिल है। फिलहाल गुप्ता जी अपनी एक छोटी सी दुकान चलाते हैं और वहां से होने वाली आमदनी भी जरूरतमंदों की सेवा में खर्च कर दी जाती है। ऐसे दिव्य पुरूष को सिटीमेल न्यूज नमन करना है। जो खुद असक्षम होते हुए भी दूसरों लोगों की सेवा में दिन रात समर्पित हैं।

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