Friday, April 16, 2021
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खुद संकट झेलकर भी अपनी सैलरी से इन बच्चों का भविष्य बनाने में जुटा है पुलिस का ये जवान

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Sanjay Kapoorhttps://citymailnews.com
Sanjay kapoor is a chief editor of citymail media group

अभी तक आपने पुलिस वालों को चोरों के पीछे ही भागते देखा होगा। पुलिस वालों को गाली की जुबान में बात करते देखा होगा, मगर पुलिस की डयूटी में उन्हें इतना समय नहीं मिल पाता कि वह मानवता का काम भी कर सकें। सभी जानते हैं कि पुलिस की डयूटी में से समय निकालना कितना मुश्किल है। मगर आज हम आपको इंदौर के एक ऐसे पुुलिस के जवान से मुलाकात करवाएंगे, जोकि अपने मानवता के कारनामे से शहर में हीरो बन गया है। इस पुलिस वाले का नाम संजय सांवरे, जोकि 40 साल की उम्र का है।

छोटे बच्चों को साक्षर करने में जुटे हैं संजय

इंदौर के रहने वाले संजय सांवरे ने छोटे छोटे बच्चों को साक्षर करने का बीड़ा अपने कंधों पर उठाया हुआ है। वह ना केवल अपनी पुलिस की डयूटी बजाते हैं, बल्कि इन छोटे बच्चों का भविष्य बनाने में भी जुटे हैं। उन पर अपनी जेब से पैसे खर्च कर इन बच्चों को किसी लायक बनाने की धुन सवार है। हालांकि संजय सांवरे को खुद भी आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है, इसके बावजूद वह अपने लक्ष्य से भटकते नहीं है।

संजय के काम में दोस्त भी करते हैं मदद

पुलिस कर्मचारी संजय सांवरे अपने खर्चे पर झुगगी के बच्चों को पढ़ाने के लिए किताबें, स्कूल बैग और कापियां दिलवाते हैं। संजय के इस पुनीत कार्य में उनके कुछ दोस्त भी उनकी मदद करते हैं। हालांकि संजय के परिवार की आर्थिक हालत ठीक नहीं हैे, मगर फिर भी वह इस कार्य को करने से पीछे नहीं हटते। उन्होंने 2016 से इन बच्चों को पढ़ाने का अभियान शुरू किया था और जोकि चार साल बाद आज भी जारी है। संजय का कहना है कि जो तकलीफ उन्होंने खुद झेली हैं, वह किसी और बच्चे को ना उठानी पड़ें। इसलिए जितना हो सकता है, वह उतनी कोशिश कर झुगगी में रहने वाले इन बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं।

पचास हो गई पढऩे वाले बच्चों की संख्या

संजय सांवरे का मानना है कि शिक्षित बच्चे ना केवल खुद का भविष्य बनाने में सक्षम होते हैं, बल्कि वह दूसरों का भविष्य बनाने में भी मददगार साबित हो जाते हैं। इसलिए ही वह इन बच्चों को पढ़ा लिखाकर शिक्षित बनाना चाह रहे हैं। आपरेशन स्माईल के तहत संजय और उनके कुछ दोस्त इस अभियान से जुड़े हुए हैं। संजय बताते हैं कि जब उन्होंने इस बच्चों को पढ़ाने की शुरूआत की थी, तब एक या दो बच्चे ही आ पाते थे, मगर आज यह संख्या 50 बच्चों तक पहुंच गई है। उनके पास अधिकांश आने वाले बच्चों की उम्र 1 से 10 साल के भीतर होती है। संजय हर रविवार बच्चों को पढ़ाते हैं और उनके दोस्त भी उनकी इसमें पूरी मदद करते हैं। इस तरह से संजय सांवरे अपनी डयूटी के साथ साथ इस नैतिक जिम्मेदारी को भी बाखूबी निभा रहे हैं।

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