Friday, April 23, 2021
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70 सालों से लोगों को पढ़ाने की सेवा से जुड़े हैं 102 साल के बुजुर्ग नंदा, इस जज्बे के लिए मिला पदमश्री पुरस्कार

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जज्बा और संघर्ष के लिए कभी कोई भी उम्र बाधा नहीं बनती। सीखने व सिखाने के लिए उम्र के हर पड़ाव पर कोशिश की जा सकती है। यह साबित कर दिखाया है 102 वर्ष की उम्र के नेकदिल नंदा मस्तरे ने। अपनी उम्र को पीछे छोडक़र ये बुजुर्ग अपने गांव के बुजुर्ग और बच्चों को शिक्षित करने के अभियान में लगे हैं। बेशक आज उनकी उम्र इस पड़ाव पर है, जब लोग बीमारी या खटिया पकड़ लेते हैं। मगर इस साहसी बुजुर्ग ने अपनी उम्र को मात देते हुए नेकी कर दरिया में डाल वाले मुहावरे को अंजाम देते हुए हर रोज लोगों को पढ़ाने का काम करते हैं।

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मात्र 7 वीं पास हैं नंदा

सातवीं पास नंदा पिछले 70 सालों से साक्षरता के इस अभियान को आगे बढ़ाए हुए हैं। ओडिसा के सुकिंदा ब्लॉक के कांतिरा में रहने वाले नंदा को उनकी सेवा व समर्पण भाव के लिए सरकार ने पदमश्री पुरस्कार से नवाजा है। उनका इरादा अपने गांव से अनपढ़ता को दूर भगाना है, अपनी इस सोच को सार्थक करने के लिए वह सुबह से लेकर देर रात तक अपने अभियान को जारी रखते हैं।

आर्थिक संकट की वजह से नहीं पढ़ पाए आगे

परिवार की आर्थिक स्थिति खराब थी, इसलिए नंदा सातवीं कक्षा से ज्यादा नहीं पढ़ पाए। मगर उनके भीतर शिक्षा की अलख जगाने का जज्बा जरूर था। इसलिए वह गांव और आसपास के बच्चों को मुफ्त में ही शिक्षा का ज्ञान बांटने लगे। वह अब तक अपने गांव की तीन पीढिय़ों को शिक्षा का प्रसाद बांट चुके हैं। नंदा सुबह 9 बजे से शाम को 4 बजे तक अपनी झोंपड़ी से ही बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू करते हैं। 2 घंटे का रेस्ट लेने के बाद वह फिर से 6 बजे अपनी क्लास शुरू करते हैं, जोकि रात 9 बजे तक जारी रहती है।

पदमश्री पुरस्कार मिलने का नहीं सोचा था

पदमश्री पुरस्कार मिलने से हैरान नंदा कहते हैं कि उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि देश के इस सर्वोच्च पुरस्कार के लिए उनका नाम आएगा। मगर उन्हें इस बात की खुशी भी है। इस प्रकार के प्रोत्साहन पुरस्कारों से लोगों का समाजसेवा के प्रति रूझान बढ़ता है और प्रेरणा मिलती है। वह इसके लिए सरकार का आभार जताते हैं। नंदा बताते हैं कि उन्हें इस पुरस्कार के मिलने की जानकारी अखबार और पत्रकारों के माध्यम से प्राप्त हुई थी। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वह इसके लिए भी चुने जा सकते हैं।

 

 

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