Tuesday, April 20, 2021
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इंसानियत जिंदा है, मिसाल बना बिजनेसमैन हितेश, अपना काम छोडक़र जुट गया मानवता की सेवा में

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इस युवक ने खुद का बिजनेस छोडक़र मानवता के काम को सर्वोपरि माना और अपना काम छोडक़र जुट गए लोगों की सहायता करने में। यह कहानी है हितेश नाम के युवक की, जिन्होंने कोरोना काल में शुरू किया मानवता का काम, आज भी जारी रखा हुआ है। राजस्थान यूनिवर्सिटी से एमबीए की पढ़ाई करने वाले युवक हितेश के दिल में जब लोगों की सेवा भाव का जज्बा आया तो वह बिना कुछ सोचेे समझे, इस काम में जुट गए। हालांकि यह काम बहुत मुश्किल था, मगर उन्होंने परवाह नहीं की और रात दिन लोगों की सेवा करने के लिए खुद को समर्पित कर दिया।

एमबीए हितेश इंदौर में रहते हैं

राजस्थान से एमबीए करने वाले हितेश अपने परिवार के साथ मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में रहते हैं। उनका एक सात वर्ष का बेटा और पत्नी है। दरअसल हितेश ने अब अपने इस छोटे से परिवार को इतना बड़ा बना लिया, जिनकी सेवा करना वह अपना परम कर्तव्य समझते हैं। हितेश ने अपना बिजनेस छोडक़र एक डिलीवरी बॉय की तरह से काम करना शुरू कर दिया है। वह लोगों को एक फोन कॉल पर दवाई उपलब्ध करवाते हैं। वह भी असली लागत पर,जिसमें उनका सेवा शुल्क नहीं होता। इस सेवा को उन्होंने कोरोना काल में आरंभ किया था, जोकि आज तक जारी है।

twitter/hiteshgungan

 

देवता तक कहते हैं लोग उन्हें

वह बताते हैं कि जब वह लोगों के पास दवाई लेकर समय पर पहुंचते हैं कि वहीं लोग उनका आभार भी जताते हैं। कई लोग तो उन्हें देवता तक की उपाधि से भी नवाजते हैं। आज उनके इस परिवार में सैंकड़ों लोग शामिल हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि लॉकडाऊन लगने के बाद मार्च में उन्होंने जब लोगों को दवाईयों के लिए दुख तकलीफ में देखा, तब उन्होंने निर्णय लिया कि वह उन तक दवाई पहुंचाने की सेवा करेंगे।

बाजार भाव पर देते हैं सामान

इस तरह से हितेश का यह निर्णय आज भी लोगों के लिए बेहतरीन सुविधा बना हुआ है। दवाईयों के अलावा जब भी लोग उन्हें फोन कर कुछ और जरूरत का सामान मांगते हैं तो वह भी पहुंचा देते हैं। वह लोगों से जो भी आर्डर लेते हैं और वह सामान बाजार की कीमत पर ही पहुंचाते हैं। जिसका कोई शुल्क वह नहीं लेते हैं। हितेश का कहना है कि ये काम उनके लिए कतई आसान नहीं था। लॉकडाऊन में कठोर नियमों के चलते वह अक्सर परेशान हो जाते थे और लोगों तक सामान पहुंचाने में उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ता था।

रूखेपन का भी करते हैं सामना

हितेश बताते हैं कि इस नेक काम के लिए उन्हें सुबह 4 बजे उठना पड़ता है। वह अपनी कार से दिन भर लोगों तक उनकी जरूरत का सामान पहुंचाते हैं। इसके लिए वह सुरक्षा के सभी उपाय भी अपनाते हैं। वह अभी तक करीब 600 से भी अधिक लोगों तक अपनी सहायता पहुंचा चुके हैं। इस होम डिलीवरी की एवज में कई बार उन्हें लोगों के रूखेपन का भी सामना करना पड़ता है, मगर वह इसेे जल्द ही भूल जाते हैं और फिर से अपने काम में जुट जाते हैं।

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