Friday, February 26, 2021
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इस तरह से बूढी मां की मेहनत रंग लाई, 4 साल के लंबे संघर्ष के बाद नेपाल की जेल से रिहा हुआ बेटा

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Sanjay Kapoorhttps://citymailnews.com
Sanjay kapoor is a chief editor of citymail media group

मां अपने बेटे की जेल से रिहाई के लिए सडक़ पर भीख मांगने लगी। 75 साल की बूढी मां को अपने बेटे की रिहाई के लिए सात लाख रुपए चाहिए थे। नेपाल की जेल में बंद बेटे की रिहाई के लिए दर दर की ठोंकरे खाती रही। चार साल से भी ज्यादा समय तक बूूढी मां अपने बेटे को जेल से आजाद करवानरे में जुटी रही और आखिर इस तरह से कुछ लोग उनकी मदद के लिए आगे आए। ये काफिला बनता गया और आखिरकार मां अपने बेटे को जेल से छुड़ाने में सफल रही।

भावुक कर देने वाली है इस मां की कहानी

यह कहानी यूपी के वाराणसी में रहने वाली 75 साल की अमरावती देवी की। इस मां ने अपने बेटे को छुड़ाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। मां के हौंसले, जज्बे और कई सालों के संघर्ष की बदौलत कुदरत भी उनके सामने हार गई। इस तरह से जब बेटा नेपाल की जेल से रिहा होकर आया तो मां की आंखों में आंसू ही आंसू थे। बेटे और मां के इस मिलन को देखकर लोग भावुक हो गए। उनमेें से कईयों की आंखों में भी आसू छलक रहे थे।

इस तरह से जेल पहुंचा बेटा

दरअसल अमरावती देवी का बेटा महेंद्र पेशे से ट्रक चालक है। वह और दिनों की तरह से उस दिन भी भारत से सब्जी लेेकर काठमांडू नेपाल जा रहा था। नेपाल में अचानक महेंद्र के ट्रक से एक बाईक चला रहे युवक का एक्सीडेंट हो गया ,जिसमें उसकी मौत हो गई। पुलिस ने इस केस में महेंद्र को दोषी पाते हुए उसे जेल भेज दिया। नेपाल का एक प्रावधान है कि ऐसे मामलों में हर्जाने के तौर पर पैसे देकर आरोपी को रिहा करवाया जा सकता है। इसके लिए नेपाल सरकार को सात लाख रुपए देकर ही महेंद्र को छुड़वाया जा सकता था। पंरतु अमरावती देवी के पास इतने रुपए नहीं थे। वह तो पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर थी और बेटे को छुड़ाने के लिए इतनी बड़ी रकम कहां से लाए।

मगर मां ने नहीं मानी हार

परंतु अमरावती देवी ने हार नहीं मानी और अपना संघर्ष शुरू कर दिया। वाराणसी में जो भी वीआईपी आता, उसके सामने वह अपने बेटे की रिहाई की मांग को लेकर सडक़ पर खड़ी हो जाती। क्या सीएम और क्या पीएम हर किसी से उसने मदद मांगी। मगर चारों ओर से उसे निराशा ही हाथ लगी। एक दिन वह बेटे की रिहाई के लिए रुपए इकठ्ठे करने के लिए सडक़ पर भीख मांग रही थी। तभी बीएचयू के एक पूर्व छात्र यतिंद्र पांडे की उन पर नजर पड़ी। बूढी अम्मा से उसने बात कर सारी जानकारी ली।

पांडे ने मदद करने का बीड़ा उठाया

अमरावती की कहानी सुनकर पांडे ने उनकी मदद करने की ठानी और महेंद्र की रिहाई के लिए अभियान चला दिया। काफी मेहनत करने के बाद पांडे अपने दोस्तों की मदद से आधे रुपए ही इकठठे कर पाए। हालांकि इस दौरान उन्होंने नेपाल सरकार से बातचीत भी की, लेकिन बिना जुर्माना अदा किए महेंद्र को रिहा करने पर साफ तौर पर मनाही हो गई। इसके बाद बीएचयू के सभी पूर्व छात्रों ने नेपाल के चौधरी फाऊंडेशन से संपर्क साधा। इसके बाद ही बाकि के रुपए चौधरी फाऊंडेशन ने मदद के तौर पर जमा करवाए। इस लंबे और चार साल के संघर्ष के बाद महेंद्र को जेल से रिहा करवाया जा सका।

बुजुर्ग अम्मा ने इन बच्चों को बताया मसीहा

बुजुर्ग अमरावती देवी ने इस मदद पर कहा कि जब उसके लिए सभी दरवाजे बंद हो गए, तब बीएचयू के छात्र उनके जीवन में मसीहा बनकर आए। उनकी मदद से ही महेंद्र को नेपाल की जेल से रिहाई मिल पाई है। वह इन बच्चों का जीवन भर अहसान नहीं भूल पाएगी और उनका वह तहेदिल से आभार जताती है। हालांकि धन्यवाद के लिए उनके पास शब्द नहीं है, मगर उनका दिल जानता है कि यदि ये बच्चे मदद के लिए ना आते तो आज भी उनका बेटा जेल में ही होता।

 

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