Wednesday, April 21, 2021
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दिव्यांगता को दी मात, खुद लिखी अपनी तकदीर, जानें दुनिया की नंबर-1 पैरा बैडमिंटन चैंपियन की कहानी

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पहले पोलिया हुआ और फिर एक एक्सीडेंट में चोट लगी, मगर आज है वह देश की नंबर-1 पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी। यह कहानी है पारूल दलसुखभाई परमार की, जिन्होंने तमाम कठिनाईयों को चुनौती मानते हुए खुद अपनी तकदीर लिखी। गुजरात में जन्मीं पारूल एक सुपरवूमैन की तरह से खेलती है, जब वह मैदान पर होती है तो उसकी चीते जैसी फुर्ती देखकर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। 47 साल की उम्र में भी पारूल पैरा बैडमिंटन की डब्ल्यूएस एसएल-3 श्रेणी में दुनिया की नंबर-1 खिलाड़ी का ताज अपने सिर पर सजाए हुए हैं। वह पिछले एक दशक से भी अधिक समय से इस पोजीशन को अपने नाम पर किए हुए है।

राष्ट्रपति से मिला अर्जुन पुरस्कार

पारूल परमार की इस उपलब्धि को देखते हुए वर्ष 2009 में राष्ट्रपति द्वारा उन्हें अर्जुन पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। गांधीनगर गुजरात की रहने वाली पारूल को कम उम्र में पोलियो हो गया था। वह इस बीमारी से उभरने की कोशिश कर रही थी कि एक और एक्सीडेंट ने उनके नन्हे से जीवन में तूफान ला दिया। पारूल झूले से गिरकर चोटिल हो गई थी,जिसके चलते उनकी गर्दन की हडडी में चोट आ गई थी और उनके दाहिने पैर में फ्रैक्चर हो गया था। ठीक होने में उन्हें लंबा समय लगा, मगर उनकी दिव्यांगता उसी तरह से रही।

बैडमिंटन खिलाड़ी थे पारूल के पिता

पारूल के पिता बैडमिंटन के खिलाड़ी थे, इसलिए जब भी खेलने जाते तो अपनी बेटी को साथ ले जाते थे। पारूल अपने पिता को बैडमिंटन खेलते हुए देखकर धीरे धीरे इस खेल की ओर आकर्षित होने लगी। धीरे धीरे वह भी पड़ोस के बच्चों के साथ बैडमिंटन खेलने लगी। इस तरह से पारूल की यह यात्रा शुरू हो गई। पहली बार वहीं बैडमिंटन सिखाने वाले कोच ने उन्हें खेलने और प्रैक्टिस की सलाह दी। धीरे धीरे वह बैडमिंडन खेलने में टें्रड होने लगी और अपने परिवार के प्रोत्साहन की वजह से इस खेल को उन्होंने अपना कैरियर बनाने की ठान ली।

इस तरह से शुरू हुई पारूल की जीत की कहानी

जैसे ही पारूल ने पेशेवर रूप से बैडमिंटन खेलना शुरू किया तो वह तरक्की की राह पर तेजी से बढऩे लगीं। इस खेल में उनके साथी खिलाड़ी और परिवार के बाकि लोग भी उसका पूरा सहयोग करते थे। उन्होंने साल 2007 में वल्र्ड पैरा बैडमिंटन में सिंगल्स और डबल्स में पुरस्कार जीते। साल 2014 और 2018 में भी उन्होंने एशियन गेम्स में गोल्ड मैडल जीतकर खुद को साबित किया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुडक़र नहीं देखा। फिर वह अपनी कैटेगरी में नेशनल चैंपियन के पद पर बनी रही।

नहीं सोचा था मिलेगी इतनी सफलता

पारूल का कहना है कि उन्होंने जिदंगी में कभी नहीं सोचा था कि इस विकलांगता के बावजूद वह इस बड़े मुकाम पर पहुंच पाएगी। मगर सभी ने उसे हौंसला दिया और जब उसने ठाना कि यह करना है तो वह करती चली गई। फिलहाल पारूल टोक्यो में होने वाली पैरा ओलंपिक्स में भारत का नेतृत्व करने की तैयारी में जुटी है।

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