Monday, September 27, 2021
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ये हैं भारतीय महिला हॉकी टीम की कोहिनूर, जिनके पास खेलने के लिए नहीं होते थे जूते और हॉकी स्टिक..

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ये कहानी उन महिला हॉकी खिलाडिय़ों की है, जिन्होंने बिना साधन और गरीबी से लड़ते हुए शानदार सफलता पाई है। उनके पास हॉकी खरीदने के पैसे नहीं होते थे, खेल के साधन जुटाने के लिए वह औरों से उधार लिया करते थे, मगर एक दिन ऐसी सफलता मिली कि वह रातों रात पूरी दुनिया में मशहूर हो गईं। यह कहानी है भारतीय जूनियर महिला हॉकी टीम के खिलाडिय़ों की, जिन्होंने चिली में बेहतरीन खेलते हुए वहां की जूनियर व सीनियर दोनों ही टीमों को उन्हीं के घर में शानदार तरीके से शिकस्त दी।

चिली में जीत से मिली पहचान

इस टीम ने चिली में कुल 6 मैच खेले, जिनमें से भारतीय टीम ने पांच मैच जीते और छठा मैच ड्रॉ हो गया। इसी प्रकार से भारतीय टीम ने चिली की सीनियर टीम को भी 4 में से 3 मैच में शिकस्त दी। भारतीय टीम की इन महिला खिलाडिय़ों की असली कहानी यहीं से शुरू होती है। बात करते हैं टीम की कप्तान सुमन देवी की। जिनकी आर्थिक स्थिति इतनी बदहाल थी कि वह रुपए उधार लेकर किसी तरह से नेशनल कैंप पहुंच पाई थीं। बाद में रुपए बचाकर उन्होंने ये उधार चुकाया था।

लालरिंडकी, संगीता और सुषमा के पास नहीं थे जूते और हॉकी

टीम की बेहतरीन खिलाड़ी और मिजोरम निवासी लालरिडंकी के पास जूते खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। झारखंड की संगीता, सुषमा और डुंगडुंग के पास इतने भी पैसे नहीं थे कि वह खुद की हॉकी स्टिक खरीद सकें। वह बांस की हॉकी बनाकर प्रेक्टिस किया करती थीं। इसी तरह से टीम की और भी खिलाड़ी हैं, जिन्होंने अभाव में रहते हुए भी अपने खेल को जिंदा रखा है।

कप्तान सुमन के पिता हैं कारपेंटर

टीम की कप्तान सुमन देवी के पिता कारपेंटर हैं और बड़ी मुश्किलों से उन्होंने अपनी बेटी को इस लायक बनाया है कि वह अपना व अपने देश का नाम रोशन कर सके। दूसरी खिलाड़ी है डुगडुग, जिनका सलेक्शन साल 2019 में हुआ था। तब उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह खेलने के लिए जा सके। उनकी कोच प्रतिमा मैडम ने उन्हें टिकट के लिए पैसे दिए थे। बाद में इनाम के तौर पर मिले पैसों से उन्होंने अपनी कोच का कर्ज चुकाया।

बांस से बनाकर दी थी हॉकी स्टिक

डुगडुग का कहना है कि स्कूल में हॉकी खेलना अनिवार्य रूप से लागू था, मगर आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी की हॉकी खरीदने के पैसे नहीं थे। इसके लिए स्कूल में डांट भी खानी पड़ती थी। फिर पिता ने किसी तरह से बांस की स्टिक बनाकर दी। एक बार खेल में जीतने पर उन्हें हॉकी स्टिक गिफ्ट मिली थी। तब उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा था। एक और खिलाड़ी है लालरिंडकी, जिनके पास जूते खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। मगर उनका सलेक्शन स्पोर्टस अथॉरिर्टी ऑफ इंडिया की हॉकी एकेडमी में हुआ था। पंरतु खर्च के डर से उनके घर वाले वहां भेजने के लिए तैयार नहीं थे। जब उन्हें बताया गया कि सारा खर्च साईं में ही होगा तो वह तैयार हुए। वह खेलो इंडिया के तहत साईं सेंटर में रहकर ही अपनी तैयारी कर रही हैं। अब लालरिंडकी देश के लिए मैडल जीतने का सपना रखती है।

बांस की स्टिक से खेलती थी सपना

ऐसी ही एक और खिलाड़ी है झारखंड की सपना। वह भी गरीब परिवार से इस मुकाम तक पहुंची हैं। फिलहाल सीआरपीएफ में वह अपनी सेवाएं दे रही हैं। एक समय था, जब उनके पास भी हॉकी खरीदने के लिए पैसे नहीं होते थे। बांस की स्टिक बनाकर वह अपना काम चलाया करती थीं। हॉकी स्टिक की कीमत एक हजार रुपया हुआ करती थी, मगर उसे खरीदने से पहले घर का खर्च चलाना ही बड़ी बात हुआ करती थी। लेकिन सपना ने अपनी मेहनत और जज्बे के दम पर टीम में अपना स्थान बनाया है। फिलहाल वह सीनियर टीम में स्थान पाने के लिए मेहनत कर रही हैं। वह टोक्यों ओलंपिक में जाने के लिए ही सीनियर टीम का हिस्सा बनना चाहती हैं।

जूते खरीदने के लिए नहीं थे सपना के पास

झारखंड की संगीता एक ऐसी खिलाड़ी हैं, जिनके पास जूते खरीदने तक के लिए पैसे नहीं थे। वह नंगे पैर स्कूल जाती और वैसे ही हॉकी खेला करते थे। हॉकी स्टिक खरीदना तो दूर की बात होती थी। पापा से जिदद की तो बांस की स्टिक बनाकर दी। उससे ही वह खेला करती थीं। साईं में जब वह टे्रनिंग के लिए गई तब कोच ने उन्हें जूते खरीदकर दिए थे। ये है भारतीय महिला हॉकी जूनियर टीम की वो कोहिनूर हैं, जिन्होंने हकीकत में गरीबी से लड़ते हुए और संघर्ष के बल पर अपना खुद का स्थान बनाया है। सिटीमेल न्यूज इन सभी खिलाडिय़ों के हौंसले का सम्मान करते हुए उन्हें सैल्यूट करता है।

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