Thursday, April 22, 2021
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इस महिला ने सोहराई और मधुबनी कला के माध्यम से बनाई खुद की पहचान, विदेशों में भी लहराया भारतीय कला का परचम

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वर्तमान समय में देखा जाता है कि ज़्यादातर लोग पश्चिमी सभ्यता से आकर्षित हो रहे हैं जिसके कारण वह अपनी भारतीय संस्कृति को भूलते जा रहे हैं| लेकिन आज भी ऐसे कई लोग हैं जो भारत की संस्कृति को बचाने का कार्य कर रहे हैं| आज हम आपको एक ऐसी ही महिला के बारे में बताने जा रहे हैं जो झारखंड की सबसे प्रसिद्ध लोक कला सोहराई और मधुबनी को लोगों तक पहुंचा रही हैं| आइए जानते हैं कामिनी सिन्हा के बारे में|

Facebook/kaminisinha

रांची की कामिनी दे रही हैं लोक कला को बढ़ावा
कामिनी सिन्हा झारखंड के रांची की रहने वाली हैं| हाल ही में कामिनी सोशल मीडिया पर काफी चर्चाओं में हैं, जिसका कारण उनकी कला और उनके विचार हैं| कामिनी लोक कला सोहराई और मधुबनी पेंटिंग करती हैं और भारतीय लोक कला को विदेशों तक पहुंचा रही हैं| बता दें कि झारखंड की यह प्रसिद्ध लोक कला धीरे-धीरे लुप्त होने की कगार पर पहुँच गई है, जिसे कामिनी अपने कार्यों से बचाने का प्रयास कर रही हैं|

घर से नहीं मिला साथ तो छुप-छुपकर सीखी कला
दरअसल कामिनी के घर में सिर्फ और सिर्फ पढ़ने-लिखने का माहौल था| ऐसे में कामिनी के लिए किसी कला को सीखना आसान नहीं था| उसके बाद कामिनी की शादी कर दी गई परंतु कामिनी को अपने ससुराल वालों का भी साथ नहीं मिला| इसके बाद कामिनी ने छुप-छुपकर कला सीखने का ठाना और वह सुबह 10बजे से शाम 4बजे तक काम सीखने जाने लगीं|

आज मिलते हैं विदेशों से भी ऑर्डर
धीरे-धीरे कामिनी को ऑर्डर मिलने शुरू हो गए और उन्होंने “ओम क्रिएशन” के नाम से अपना संस्थान खोला| जब उनके परिवार को पता चला कि कामिनी इस तरह का सराहनीय कार्य कर रही हैं तो कामिनी को उनके परिवार से पूरा सहयोग मिला और आज कामिनी की कला को विदेशों में भी सराहा जा रहा है| आज विदेशों से भी कामिनी को ऑर्डर मिलते हैं|

अपने साथ-साथ जनजाति महिलाओं को भी बना रही हैं आत्मनिर्भर
बता दें कि वर्तमान में कामिनी न सिर्फ भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ा ही रही हैं, अपितु वह जनजाति महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बना रही हैं| आज कामिनी के साथ 100 से भी ज्यादा महिलाएं काम करती हैं| कामिनी कुशन कवर, साड़ी, दुपट्टा, बैग और सजावट के सामान आदि सभी पर सोहराई, मधुबनी और टिकूली पेंटिंग करती हैं|

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