Tuesday, April 20, 2021
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नई खोज : ग्रामीणों के लिए वरदान बना देबश्री का स्टोव, बिना धुआं छोड़े कम समय में पका देगा चावल दाल

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पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि बढ़ते प्रदूषण के कारण देश में सबसे अधिक जाने जा रही है। खतरनाक जहरीला धुआ आपको न केवल सडक़ पर चलने से बल्कि घर में खाना बनाते समय भी मिलता है। इसी जहरीले धुएं से लोगों को बचाने के लिए ओडिशा की रहने वाली 23 साल की देबश्री ने एक ऐसे स्टोव का अविष्कार कर दिया जो बिना धुआ छोड़े ही पांच मिनट के भीतर आपकी दाल और चावल बना देगा। ऐसे में न सिर्फ आपको धुए से राहत मिलेगी। बल्कि खाना भी सामान्य गैस की तुलना में जल्दी पक जाएगा।

स्टोव से नहीं निकलता बिल्कुल भी धुआ

अधिकतर स्टोव खाना बनाते समय काला धुआ छोड़ते हैं। ग्रामीण जगहों पर अभी भी स्टोव का ही प्रयोग किया जाता है। ऐेसे में खाना बनाने के दौरान जब यह स्टोव काला धुआ छोड़ते हंै तो लोगों के लिए सांस लेना मुश्किल हो जाता है। देबश्री बताती है कि उनका स्टोव 0.15 पीपीएम से भी कम कार्बन मोनोआक्साइड छोड़ता है। स्टोव को जलाने के लिए किसी तरह की लकडिय़ों की जरूरत नहीं पड़ती है।

बचपन में धुए के चलते किचन में जाने की नहीं थी अनुमति

देबश्री बताती है कि बचपन में धुंए के चलते उन्हें अपने किचन की जाने की अनुमति नहीं थी। हालांकि ऐसा केवल उनके घर पर नहीं था। बल्कि गांव के सभी घरों में बच्चों को धुएं की वजह से किचन में नहीं जाने दिया जाता था। वह बताती है स्टोव पर खाना बनने के कारण परिवार वालों के आंखों में भी दिक्कत रहने लगी थी।

कॉलेज से प्रोजेक्ट मिलने के दौरान बदली सोच

देबश्री कहती है कि उन्होनें मैसूर के सेंट्रल इंस्टीट्यूट आफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंड टैक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की शिक्षा ली। इसी कॉलेज में उन्हें प्रोजेक्ट दिया गया कि एक ऐसी समस्या का समाधान खोजा जाए जो एक व्यापक जनसमुदाय को प्रभावित करती हो। काफी सोचने के बाद देबश्री को ऐसा स्टोव बनाने का आइडिया आया जो बिना धुआ छोड़े कम समय में खाना पका देता हो। क्योंकि वह बचपन से ही अपने परिवार व अन्य लोगों को इंडोर प्रदूषण की समस्या से जूझते हुए देख रही थी। इसी कालेज प्रोजेक्ट में देबश्री ने स्टोव को तैयार किया। देबश्री कहती है कि उनकी इस खोज को केंद्र सरकार की ओर से भी प्रोत्साहन दिया गया। अनेक परीक्षण में सफल होने के बाद कालेज प्रबंधन की ओर से उन्हें केंद्र सरकार के सुक्ष्म लघु और मध्यम इंटरप्राइजेज इनक्यूबेशन में भाग लेने के लिए कहा गया। वहां के आयोजकों के देबश्री के अविष्कार को न केवल पसंद किया, बल्कि उसको आगे बढ़ाने के लिए सवा छह लाख रुपए की धनराशि भी दी।

अपने गांव से ही स्टोव की शुरुआत
देवश्री बताती है कि उन्होंने पैलेट बनाने वाली मशीन किसानों को किराए पर देते हुए स्टोव बिक्री की शुरुआत अपने गांव से की है। क्योंकि अपने गांव में वह बचपन से धुएं की समस्या को देख रही थी। उनके अनुसार पैलेट बनने से जो भी लाभ कमाया जाता है वह किसानों में बांट दिया जाता है। अब देबश्री के गांव के प्रत्येक व्यक्ति ने स्टोव का प्रयोग करना शुरू कर दिया है। वह बताती है कि उन्हें काफी खुशी है कि उनकी खोज ग्रामीणों के लिए वरदान साबित हो गई। इससे न केवल खाना कम समय में पकेगा बल्कि लोगों की सेहत भी अच्छी रहेगी।

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