Tuesday, April 20, 2021
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दिव्यांगता को बनाया हथियार, जिद से बदल रहे जरूरतमंद बच्चों की दुनिया

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आज के समय में कुछ युवा जीवन में थोड़ा सा असफल होते ही निराश हो जाते हैं। उनके लिए जीवन के मायने बदल जाते हैं। ऐसे युवाओं के लिए रूद्रप्रयाग जिले के स्यूर गांव के रहने वाले विनोद सिंह नेगी जीवन के प्रेरणा स्त्रोत बन सकते हैं। जिन्होंने न केवल अपनी दिव्यांगता को खुद के लिए हथियार बनाया। बल्कि अपनी जिद से शिक्षा के अभाव में जीवन जीने वाले बच्चों की भी दुनिया बदल डाली।

18 महीने की उम्र में हो गए पोलियो का शिकार 

विनोद सिंह नेगी के जीवन में 18 महीने की उम्र में ही तूफान आ गया। जब पोलियो के कारण उनके दोनो पैरों ने काम करना बंद कर दिया। इसके बाद भी उनके जीवन की मुश्किल कम नहीं हुई। दो साल की उम्र में उनके सिर से पिता का साया उठ गया। ऐसे में न केवल उन पर बल्कि उनका परिवार भी पूरी तरह से टूट गया। इसके बावजूद विनोद ने तमाम मुश्किलों से लड़ते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी।

मुश्किल परिस्थितियों में दादा ने दिया पोते का साथ

विनोद बताते है कि उनका जन्म 1 जनवरी 1988 को रूद्रप्रयाग जिले में हुआ। दो माह में पैर में पोलियों होने के कारण उनके जीवन में तूफान आ गया। मुश्किल परिस्थितियों में अगर उनके दादा साथ नहीं देते तो वह पूरी तरह से टूट जाते। उनके दादा ने उन्हें शिक्षा दिलवाने की जिम्मेदारी ली। वह उन्हें गोद में उठाकर स्कूल तक ले जाते है। दोनों पैर के काम नहीं करने के कारण वह तमाम परेशानियोंं से गुजरे। कक्षा में पढ़ाई करने के दौरान में भी उन्हें काफी तकलीफ होती। लेकिन दादा उन्हें हौसला देते। जिसके बाद वह दोबारा से जीवन में संघर्ष करने के लिए उठ खड़े होतेे।

पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी हासिल करना बना चुनौती

विनोद के अनुसार पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी हासिल करना उनके लिए बड़ी चुनौती था। क्योंकि दिव्यांग इंसान को अक्सर सामान्य लोग कमजोर समझते हैं। हालांकि वह पढ़ाई हासिल करने के दौरान ही इस बात को समझ चुके थे। ग्रेजुएट होने के बावजूद उनकी राह में नौकरी हासिल करने के लिए कई रोड़े आने वाले हैं।

संस्था की सचिव ने दिखाया आगे का रास्ता

विनोद बताते है कि अगर आप जीवन में हार नहीं मानते तो ऊपर वाला भी आपकी समस्याओं का समाधान करता हुआ चला जाता है। जब वह नौकरी की तलाश कर रहे थे तो उनकी मुलाकात एक एनजीओ की सचिव मधु मैखुरी से हुई। मधु ने उन्हें कंप्यूटर का प्रशिक्षण हासिल करने में मदद की। कंप्यूटर का प्रशिक्षण हासिल करने के बाद वह पूरी तरह से आत्मनिर्भर बन गए।

अब जरूरतमंद बच्चों की जिंदगी संवारने का बनाया मिशन

विनोद कहते हैं कि उन्होंने अपना जीवन पटरी पर आने के बाद अपने जैसे दिव्यांग बच्चो और गरीब बच्चों का जीवन पटरी पर लाने का प्रयास किया। उन्होंने जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा देने का काम किया। उन्होंने अपने बचत के पैसों से एक कंप्यूटर संस्थान शुरू किया। इस संस्थान में गरीब बच्चों को निशुल्क डिजिटल साक्षर बनाना शुरू कर दिया। हालांकि इसको चलाने में शुरुआत में थोड़ी बहुत परेशानी सामने आई। लेकिन धीरे धीरे सब ठीक हो गया। अब उनके जीवन का मिशन केवल गरीब बच्चों को सही दिशा में ले जाने का है।

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