Friday, April 23, 2021
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पहाड़ में सडक़ बनाने में सरकार रही नाकाम, अपना सबकुछ बेचकर खुद बना दिया 38 kM का रास्ता

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काफी समय पहले बिहार में पहाड़ों को काटकर सडक़ बनाने वाले दशरथ मांझी पूरे देश में चर्चा का विषय रहे। उन्होंने साबित कर दिया कि अपनी मेहनत से पहाड़ को भी झुकाया जा सकता है। इस विषय पर बॉलीवुड ने एक फिल्म भी बनाई। हाल में ही लद्दाख के माउंटन मैन ने भी यह कारनामा कर दिखाया है। उन्होंने पहाड़ों का सीना चीरकर 38 किलोमीटर की सडक़ बना दी। इसके लिए उन्हें अपनी पूरी संपत्ति दांव पर लगानी पड़ी। इसके लिए भारत सरकार की ओर से उन्हें पद्मश्री भी दिया गया। इनका नाम है लामा त्सुलटिक छोंजोर। जिन्होंने न केवल अपने लिए बल्कि ग्रामीणों के लिए पहाड़ों में से रास्ता निकाल दिया।

70 साल की उम्र में लामा त्सुलटिम ने किया कारनामा

पहाड़ को काटकर सडक़ बनाने वाले 70 साल के त्सुलटिम ने यह कारनामा 70 साल की उम्र में किया। इस उम्र में लोग बिस्तर पकड़ लेते हैं। उन्होंने अपनी मेहनत से साबित कर दिया कि लगातार प्रयास करने से किसी भी लक्ष्य को छुआ जा सकता है।
सडक़ बनाने में खर्च कर दी पूरी संपत्ति
जंस्कार घाटी के लोगों के लिए लामा त्सलटिम मेमे छोंजोर है। इसका अर्थ वहां की स्थानीय भाषा में दादा छोंजोर होते हैं। 38 किलोमीटर की सडक़ बनाने के बाद छोंजोर अपने गांव में जीप से पहुंचे। छोंजोर को जीप से आता देखकर गांव के लोगों में खुशी का माहौल है। लामा त्सुलटिम छोंजोर को पद्मश्री मिलने से जंस्कार घाटी में खुशी का माहौल है। इसके साथ ही हिमाचल के जनजातीय जिला लाहु स्पीति में भी खुशी का माहौल है।

ग्रामीणों को होगा सडक़ से फायदा

लामा त्सुलटिम छोंजोर ने पहाड़ों को काटकर जो सडक़ बनाई है उससे ग्रामीणों सहित हिमाचल राज्य को भी फायदा पहुंचेगा। क्योंकि सीमा सडक़ संगठन (बीआरओ) अब दारचा-शिंकुला दर्रा सडक़ परियोजना पर कार्य कर रहे हैं। इस सडक़ के द्वारा शिंकुला दर्रा और करगया गांव का सफर आसान हो गया।

अपनी संपत्ति बेचकर खरीदी 57 लाख की मशीन

लामा त्सुलटिम ने अपने लक्ष्य को लेकर कोई भी समझौता नहीं किया। उन्होंने वह सब कर दिया जो किया जा सकता था। त्सुलटिम ने अपनी पूरी संपत्ति बेचकर 57 लाख रुपए की मशीन खरीदी। इसके बाद उन्होंने कारगिल जिले के जंस्कार के करग्या गांव में हिमाचल प्रदेश की सीमा तक सडक़ निर्माण की पहल की। लामा त्सुलटिम कहते है कि जंस्कार में सडक़ संपर्क स्थापित होना ही उनके लिए सबसे बड़ा इनाम होगा। वह बताते है कि उन्होंने सडक़ बनाने के लिए किसी की भी मदद नहीं ली। जब उन्होंने इसकी शुरुआत की तब अनेक लोगों ने भी इनका मजाक उड़ाया। लेकिन लामा त्सुलटिम ने अपना लक्ष्य नहीं छोड़ा। लामा त्सुलटिम को उनके इस काम के लिए कई जगह सम्मानित किया जा चुका है।

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