Saturday, April 17, 2021
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माता पिता के साथ जंगल से जाकर लाते थे लकड़ी, फिर बने जंंगल के रखवाले, अब मुख्यमंत्री से मिला वन पदक का खिताब

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शहरों में बढ़ते विकास की बलि हमारे जंगल चढ़ रहे हैं। आए दिन विकास के नाम पर जंगलों को उजाड़ दिया जाता है। लेकिन अभी भी कुछ जगहों पर ऐसे लोग है जो जंगलों के रखवाले बने हुए है। उनका जीवन जंगलों के पेड़ पौधों की देखभाल में लग गया है। ऐसे लोगों में ट्राइबल वॉचर रवि का नाम शामिल है। रवि ने अपना जीवन जंगलों की देखरेख में समर्पित कर दिया है। मु़दृगा जनजाति से संबंध रखने वाले रवि 32 सालों से जंगल का हिस्सा है। वह जंगल में प्रत्येक पेड़ उसकी आयु और खासियत के बारे में जानते हैं। रवि को जंगलों की देखभाल के लिए मुख्यमंत्री की ओर से आदिवासी वॉचर्स का खिताब दिया गया।

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माता पिता के साथ जाते है जंगल में लकड़ी उठाने

रवि बताते है कि वह बचपन में अपने माता पिता के साथ जंगल के लकड़ी उठाने के लिए जाते थे। धीरे धीरे उन्हें जगल से प्यार हो गया। वह वन विभाग की तलाशी अभियान का भी हिस्सा थे। वह बताते है कि वन विभाग के गार्ड को जंगल में कोई भी मदद चाहिए होती थी तो वह उनके पास ही आते थे। रवि बताते है कि उनका मुख्य शौक जंगल घूमने का था। जंगल के मुख्य क्षेत्र जैसे सरींधि नीकीकल्ल, वालकड, और पूचीपारा में काम किया था। इस समय वह नीलिकल्ला में काम कर रहे हैं।
शोधकर्ताओं की भी मदद करते है रवि

रवि न सिर्फ वन विभाग के गार्ड की बल्कि शोधकर्ताओं की भी मदद करते हैं। देशभर में साइलेंट वैली में शोधकर्ता आते है। जो वनस्पति और अन्य पौधों पर रिसर्च करते हैं। ऐसे में रवि उनकी मदद करते हैं। रवि कहते है कि अगर मेरे मदद करने से शोधकर्ताओं को कुछ नया मिलता है तो यह मेरे लिए खुशी की बात होगी। साइलेंट वैली पार्क के पूर्व सहायक एम विमल ने बताया कि रवि ने कई पेड़ों कों बचाया है। उसे जंगल के चप्पे चप्पे के बारे में जानकारी है। वह बताते है कि मुख्यमंत्री वन पदक के लिए चुने जाने वाले रवि एकमात्र पहरेदार थे। वह बताते है कि जंगल के प्रति रवि के योगदान को युगों तक याद किया जाएगा। रवि अपने काम से मिलने वाले प्रोत्साहन से काफी खुश है।

 

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