Sunday, April 18, 2021
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जीना इसी का नाम है, खुद कैंसर से जूझ रही है, मगर बेसहारा व भूखे बच्चों को खिलाती है हर रोज खाना

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जीना इसी का नाम है, जीवन में चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों ना आएं, मगर इंसान को कभी भी सब्र और धैर्य नहीं खोना चाहिए। जिंदगी जीना कभी भी आसान नहीं होता, हर किसी के जीवन में मुश्किलें आती है, धैर्य व हिम्मत से जो लोग इन मुश्किलों का सामना करते हैं, आखिर में जीत उनकी ही होती है।

हिम्मत और धैर्यवान है आंचल

ऐसी ही एक हिम्मत और धैर्यवान महिला की कहानी से आपको रूबरू करवाने जा रहे हैं। ये महिला खुद एक जानलेवा बीमारी से ग्रस्त है, बावजूद इसके वह इस बीमारी से हार मानने की बजाए खुशी खुशी अपना जीवन जी रही हैं। बात कर रहे हैं दिल्ली निवासी आंचल शर्मा की, जोकि वर्ष 2017 से स्तन कैंसर से पीडि़त हैं। उन्हें उसी साल पता चला कि उन्हें स्तन कैंसर है। मगर उन्होंने दुख या हार मानने की बजाए इस जानलेवा बीमारी का सामना करने का निर्णय लिया। द बेटर इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार आंचल ने अपनी इसी बीमारी को अपने खिलाफ लेने की बजाए उसे दूसरों का सहारा बनाने का निर्णय लिया।

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चुना भलाई का रास्ता

इसके चलते आंचल ने सबसे पहले गरीब व बेसहारा बच्चों का सहारा बनाने का रास्ता चुना। वह आसपास की झुगगी में रहने वाले गरीब व फुटपाथ पर सोने वाले बच्चों का पेट भरने लगीं। वह हर रोज 200 बच्चों को खाना खिलाती हैं और उनकी दुआएं इकठ्ठी करती हैं। ताकि उन्हें इस खतरनाक बीमारी से लडऩे की हिम्मत मिले।

मुसीबतों भरा रहा है आंचल का जीवन

कैंसर की बीमारी से लड़ रही आंचल का जीवन शुरू से ही मुसीबतों से भरा रहा है। पिता ऑटो चालक थे और उनकी शराब की लत से पूरे घर को परेशानी झेलनी पड़ती थी। इस लत की वजह से घर की स्थिति इतनी बिगड़ गई कि उन्हें दो वक्त की रोटी नसीब होना भी मुश्किल हो गया। घर को चलाने के लिए मां ने कदम बाहर निकालें। एक फैक्ट्री में नौकरी शुरू की, पंरतु कहते हैं कि जब वक्त खराब होता है तो कुछ भी बेहतर नहीं होता। फैक्ट्री में छंटनी हुई तो मां की नौकरी चली गई।

भाई-बहन ने की नौकरी

दोनों भाई बहन को पढ़ाई छोडक़र इधर उधर काम करना पड़ा। भाई ने मैकेनिक का काम किया और आंचल ने एक होटल में रिसेप्शन पर नौकरी शुरू की। परंतु आंचल की होटल की नौकरी भी अधिक दिनों तक नहीं चली। बाद में रियल एस्टेट आफिस में नौकरी मिली तो वहां भी उन्हें नुक्सान ही हाथ लगा। बाद में शादी हुई तो ससुराल वालों ने दहेज के लिए तंग करना शुरू कर दिया। इस तरह से तीन महीने के भीतर ही उनका तलाक भी हो गया।

इस तरह से शुरू किया अपना चैरिटी का काम

इसके बाद आंचल ने अपनी मां के साथ रहते हुए रियल एस्टेट में काम करने की शुरूआत की। इसी दौरान उन्हें अपनी बीमारी का पता चला। एक बार आंचल अपने ईलाज के सिलसिले में डाक्टर से मिलकर वापिस आ रही थी। तब उसने रेड लाईट पर बच्चों को देखा तो उसका दिल पसीज गया। उसने एक बच्चे को पैसे देने की बजाए खाना खिलाने का सोचा। वह उसे पास ही एक होटल में ले गई। मगर होटल वाले ने बच्चे का हुलिया देखकर उसे खाना खिलाने से मना कर दिया। इसके बाद से आंचल ने ऐसे बच्चों का पेट भरने का अभियान चलाने का निर्णय लिया। इस काम के लिए उन्होंने हैप्पीनेस नाम से एक सामाजिक संस्था शुरू कर दी। इस संस्था के नेतृत्व में वह बच्चों को खाना खिलाती है। उसके इस शानदार नेक काम को देखकर एक निजी अस्पताल ने उन्हें निडर हमेशा पुरस्कार से भी नवाजा है।

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